" उत्तराखण्ड में लोक गाथायें "
" जीतू बगड्वाऴ "
जीतू और सोभनू गरीबा के बेटे थे, सुमेर उनकी माँ थी और फ्यूंली जौसू दादी , कुंजा दादा और शोभनी बहन, राजा भान शाह ने उसे बगुड़ी का सेरा ( धान वाला खेत ) दिया था ! बगुड़ी से ही उसका नाम " जीतू बगड्वाऴ " पड़ गया ! जीतू बगड्वाऴ अपने आप में मस्त रहता था, वह बड़ा रसिक (रसिया ) किस्म का था ! वह भँवरे की तरह उड़ता रहता था ! बरसात आयी तब उसे कंही खेती बाड़ी की याद आयी! बगुड़ी के खेत में धान रोपाई का दिन तय किया जाना था ! जीतू ने अपने छोटे भाई शोभनू को पंडित के पास भेजा ! पंडित ने कहा , रोपाई का शुभ दिन तो आपकी बहिन शोभनी के हाथो से सुभ हे ! सोभनू घर लौटा और पंडित द्वारा बताई गयी बात अपने भाई जीतू बगड्वाऴ को बतादी!माँ सुमेरा शोभनी को बुलावे ( लाने ) के लिए शोभनू को भेज़ना चाहती हे ! लेकिन जीतू खुद जाना चाहता हे ! माँ से वह कहता है कि वह तो नासमझ हे ! मै ही जाऊंगा !"
इसी बीच जीतू की तिल्वा बकरी छींकती है ! माँ इसे अपशकुन समझती है ! वह जीतू को रोकती है , किन्तु जीतू कहता है , माँ छह गते अषाड़ को रोपाई का दिन तय हे ! बहन को तो किसी भी प्रकार बुलाना ही पड़ेगा चाहे कुछ भी हो जाय !
जीतू जाने की तैयारी करता है ! उसकी पत्नी भी उसे रोकती है कोसती है, और कहती है , तुम तो अपनी साली बरूणा मिलने जा रहे हो , मै सब समझती हूँ !' लेकिन जीतू किसी की नहीं सुनता है ! अपनी बांसुरी लेकर चल पड़ता है !
चलते चलते भरी दोपहरी में वह रैंथल पहुंचता है और कुछ देर आराम करने के बाद अपनी नौसुरी बाँसुरी बजता है ! बाँसुरी की सुरीली तान सुन कर खैट की नौ अप्सराएँ आ जाती है ! और उनके हाथ , नाक, कान, और आँखों में बैठ कर (घुस कर ) उसका खून पीने लगती है ! जीतू अपने कुल देवता भैरब को याद करता है ! तब अप्सराएँ फिर से मिलने का वादा करके उसे छोड़ देती हैं !
जीतू अपनी बहन शोभनी के पास पहुंचता है ! फिर साली बरुणा से मिलता है ! जीतू बरूणा के रूप का दीवाना था, दोनों एक दुसरे को जी जान से चाहते हैं ! दोनों जी भर कर बातें करते हैं ! फिर जीतू अपनी साली से कहता है कि फिर न जाने मिलन होगा कि नहीं वह बेचैन कुछ उखड़ा उखड़ा भाउक नजर आता है. बहकी बहकी बातें करता है!
अपनी बहिन के साथ वह बगुड़ी लौट आता है ! धान रोपई का दिन समीप आता है ! बड़ी जोर सोर से तैयारीयाँ होती हैं ! बैलों की जोड़ी लेकर जीतू बगड्वाऴ मलारी सेरा पहुंचता है ! और रोपाई सुरु हो जाती है , जैसे ही वह खेत का बैलों के साथ दूसरा चक्कर लगता है ! वो नौ आंछरी (नौ अप्सराएँ ) उसको हर (हरण) लेती हैं ! वह खेत मेही लुडक जाता है मूर्छित हो कर डूब जाता है ! ये है जीतू बगड्वाऴ की लोक गाथा इसे लोक गीत के रूपमें भी गया जाता है !
लेखक
दर्वान नैथ्वाल
लोक गायक एवं साहित्यकार
उत्तराखण्ड

No comments:
Post a Comment